Thursday, 5 February 2009

मानवीय शोचनीय और सोचनीय

शहरी काॅलोनियों में बच्चों के खेलने के लिए मैदान छोड़े जाते हैं। हमारे मोहल्ले में और आसपास के मोहल्लों में भी चैकोर खाली मैदान छूटे हुए हैं। इन्हीं में से एक मैदान में कुछ एक दरख्त लगे हुए हैं और मैदान के किनारों पर सीवेज चेम्बरों से गंदगी निरंतर बहते रहने से मैदान सीवेज मैदान हो गया था। वर्षों सहने के बाद कुछ बाशिंदे वहां के मैदान को कचरे और मिट्टी से भरवाने में सफल हो गये। इसी मैदान में अलसुबह से लेकर रात के झुरमुट तक एक परिवार बिखरा सा दिखता है। प्रौढ़ावस्था से वृद्धावस्था की ओर जाते एक गंदी जनाना और कचरा मर्द और उनका लड़का और लुगाई और अगली पीढ़ी के टंटूगने भी।
सारे परिजन चूंकि सुअरों, कुत्तों और मलमूत्र की संगत में रहते थे इसलिए भरपूर गंदे थे। मैं हालांकि धार्मिक शास्त्रानुसार इंसानों से नफरत नहीं करने की कोशिश करता हूं पर चूंकि वो मानवीय से इतर पशु और पशु से भी अगली अवस्था में प्रवेश को मचलते से दिखते थे सो नफरत का भाव तो जगता ही था।
सुना पिछले सोमवार यानि 2 फरवरी 2009 को मेहतर और मेहतरानी पक्का पिये होंगें। शाम का वक्त था मोहल्ले के अलसेशियन, पामेरियन, डाबरमेन पालकजन अपने पालतुओं को हवा खिलाने और हल्का करने के लिए लेकर घूम फिर रहे थे। महिलाएं भी फालतू की बातों के आश्रय स्थल ढूंढ रहीं थी। बच्चे खेल रहे थे। और मोहल्ले के कुत्ते भी मस्ती में इधर उधर उछल कूद रहे थे। हमारे घर के सामने की छोटी सी सड़क के चैराहे की ओर जाते मोड़ पर एक सीवेज चेम्बर पर मेहतर और मेहतरानी धुत्त अधलेटे बैठे थे। कंदर्प के बाणों से प्रभावित मेहतर के मन में जीवन की निरर्थकता और प्रेम के प्रताप की लहरें हिलोरे ले रही थीं शराब ने इन लहरों को और रंगीन कर दिया। पहले तो दो चेहरों की दुर्गुन्धयुक्त निकटता आलिंगनों में बदली फिर गंदे आलिंगन वीभत्स चुम्बनों से समृद्ध हुए और फिर बात बढ़ते बढ़ते मुद्दे पर आ गई। चरम अवस्था भी पहुंची और सब कुछ खुल्लम खुल्ला सब कुछ चैक चैराहे पर सब कुछ अबाल महिला वृद्ध सबके सामने सम्पन्न हुआ।
पहले पहल तो घटना देखने सुनने वाली ही थी। पर जो इससे मरहूम रह गये उनके लिए घटना शोचनीय, वर्णनीय और आदिरूप से सोचनीय है। कामतंत्र में उतरे मेहतरयुगल के आस पास ही महिलाएं कुत्ते घुमा रही थीं, बच्चे खेल रहे थे। क्या यह प्रश्न उठना चाहिए कि शरीफों के सभ्य मोहल्ले से किसी ने उन्हें भगाया क्यांे नहीं। प्रत्यक्षदर्शियों से ये भी सुना कि मोहल्ले के कुत्तों ने उनके इर्द गिर्द घेरा बना लिया था और घटना को बड़े ही विचित्र भाव से देख रहे थे कुछ बेबस कुत्तों की लार भी टपकती दिखी। मोहल्ले के बच्चे पूछ रहे थे कि इन स्त्री पुरुष में किस प्रकार की और लड़ाई क्यों हो रही है ।
4 फरवरी के अखबार में भारत के किसी शासकीय न्यायालय का निर्णय था कि रेलवे स्टेशन पर पकड़े गये एक प्रेमी युगल द्वारा सार्वजनिक रूप से सवस्त्र प्रेमालाप को अपराध नहीं माना जा सकता।

Wednesday, 4 February 2009

मिलारेपा का एक गीत

अपने गुरू मारपा के चरणों को नमन करता हूं
और आपके प्रत्युत्तर में एक गीत गाता हूँ।
ध्यानपूर्वक सुनिये मैं जो कहता हँू।

देखने का सर्वोत्तम ढंग है ”अदेखे रहना“
स्वयं मन का, मन की प्रभा को।
सर्वोत्तम है वह ईनाम - जिसकी राह न तकी गई होे,
मन का अपना अनमोल खजाना।

सर्वोत्तम पौष्टिक आहार है - निराहार
जो अतुल्य भोज है समाधि का।
सर्वोपरि तृप्तियुक्त पेय है - अतृप्तता
हार्दिक सहानुभूति का अमृत

ओह! यह आत्मबोध अवधान
शब्द और विवरणातीत है
मन बच्चों की दुनिया नहीं
न ही तार्किकों की

उपलब्धि, लब्धातीत के सत्य की
जहां पहुंच है सर्वोच्च में
देखी ऊंचे और निचले की निःसारता
जब हो घुलनशीलता तक पहुंच

अनआंदोलन के
सर्वोच्च मार्ग का अनुसरण
जन्म और मरण के अंत को जानना
और सर्वोच्च आशय का पूरा होना

कारण के खोखलेपन को देखना है,
परम तर्क की सम्पन्नपूर्णता।
जब आप जानते हैं -
विशाल और छोटे के निराधारता।
तब आप प्रवेश करते हैं परम द्वार में।

अच्छे और बुरे के पार की समझ
परम कुशलता का मार्ग प्रशस्त करती है
द्वैत से विच्छेद का अनुभव
सर्वोच्च दृष्टि को गले लगाना है।

जब आप जानते हैं निःष्प्रयास का सच
आप योग्य हो जाते हैं सर्वोच्च फलन के
अज्ञानी हैं जो इस सच से मरहूम हैं
स्वार्थी गुरू सीखने से फूल कर कुप्पा हैं
शिष्य शब्दजाल में उलझे हैं
योगी पूर्वाधारणाओं से शोषित हैं
मोक्ष की वासना में बुरी तरह फंसे
जन्म जन्म की दासता ही पाते हैं

Thursday, 8 January 2009

ये कैसा जादू खास है

उम्मीद बोझ लगती है,
सपना दर्द देता है
सांस सोग लगती है,
आंसू उदास है

क्यों जिंदगी यों ठगती है,
मौत को कौन कर्ज देता है
पी लिये सभी जहर
अभी भी, क्या ये आस है

बुज्दिली मेरी न पूछो
ख्वाहिशें गर्भपात हैं
सब सर्द कर देता है
ये कैसा जादू खास है

गुनाह, आंखें मंूद लेना
अंधेरों की गर्माइश में
कोई ऐसे भी मर्ज सेता है
या मेरा होना कयास है

लफ्जों की सारी साजिशें
मेरी बेहोशी में थी निहां
कब्र तक तो पहुंचा-सा
अब किसका पास है

Wednesday, 31 December 2008

इसलिए नया साल मुबारक

यदि सच
कड़वा लगता हो
तो पढ़ना बंद कर दो
जिंदगी की किताब
...
बात उस समय की है
जब समय नहीं हुआ करता था
सब कुछ पैदा हो गया था
तुम पैदा हो गये थे
बस............ समय नहीं।
...
अब भी बहुत समय तक
पैदाइश के ....बहुत बाद तक
बहुत से लोगों का
समय पैदा नहीं होता
.......
और कुछ लोग
पैदा होते हैं ‘वक्त’ के साथ ही
जनाब!
वक्त और दुख दो चीजें नहीं होते।
..
जब खुशी हो
दिल मंे
तो सारा जहां खुश दिखता है
और पता नहीं चलता वक्त का
...
किन्हीं दुखी दिनों में
किसी शाम को
तुमने जाना था
कि ”वक्त“ जैसी कोई शै होती है
और भूले से ही
अनायास ही
तुमने
सुबह और शामें गिननी शुरू कर दीं।
काटने के लिए दुख को
...
अभी भी
जब तुम टाईम पास कर रहे होते हो
तो काटते हो दुख को
...
और अभी भी
सब कुछ
अपनी मर्जी से ही होता है,
तुम्हारे संकल्प और,
तुम्हारी मर्जी से नहीं।


तुम भी तो कहते हो न -
”वक्त से पहले, वक्त से ज्यादा
किसी को कुछ नहीं मिलता।“

अभी भी, सभी 10 बरस तक बच्चे नहीं रहते
अभी भी, सभी 25 साल की उम्र में जवान नहीं हो जाते
अभी भी सभी 80 साल की उम्र में बूढ़े नहीं होते।

तो समय का तुम्हारी जिन्दगी से
इतना बड़ा रिश्ता नहीं है
जितना तुमने खड़ा कर लिया है।

किसी वक्त नाम की शै की
जरूरत भी क्या है?
...
पर अपने ही दुख से
तुमने ही गिनना शुरू कर दिये थे
पल
पहर
सुबह शाम
दिन - रात
सप्ताह - महीने

तुमने ही बनाया
365 दिनों का एक साल
और तुम्हारे ही हिसाब से
365 दिन रात बीत गये हैं
और तुम ही खुश हो रहे हो
या,
बस आस पास के लोग
मना रहे हैं नये साल के नाम पर कुछ
और इसलिए
तुम भी
...
क्या दुख से ही,
क्या वक्त से ही
तुमने सीखा था
झूठ बोलना
क्योंकि वक्त और झूठ
हमेशा बदलते रहते हैं।
...

और.....
वक्त को जानने के बाद ही
तुमने ‘सब कुछ खुद ब खुद होने को’
‘मैंने किया’ में बदल लिया था
(मैंने किया था, मैं कर रहा हूं, मैं करूंगा)
...
हर पिछले साल के नये दिन भी
तुमने खुदसे कई वादे और संकल्प किये थे
जिसे फिर तुमने कभी भी याद नहीं किया
किसी भी साल के 364 दिनों में
...
तुम्हारी मजबूरी है कि
इतिहास को याद रखना पड़ता है
क्योंकि
तुम कुछ भी नहीं हो
कुल जमा जोड़ भी
अभी तक
...
नये साल के आने पर
तुम क्यों खुश हो
एक साल और कम हो गया है जिन्दगी का
...
पर कुछ भी हो
मैं नहीं चाहता
तुम नाराज हो जाओ - इन सब बातों से,
किसी भी बात से,
इसलिए नया साल मुबारक

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Friday, 26 December 2008

आत्म अवधान की लौ

यदि आपको होश में रहना मुश्किल लगे तो एक प्रयोग करें, दिन भर में अपने मन में आये विचारों और अहसासांे को नोट करें, अपनी प्रतिक्रियाओं जलन, ईष्र्या, दिखावे, विषयासक्ति, आप जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं, अपने शब्दों के पीछे जो आशय था और ऐसी ही बातों को नोट करें।
नाश्ते के पहले कुछ समय और रात को सोने से पहले तक की बातें अत्यावश्क रूप से ये सारी बातें नोट करें। ये सब बातें जब तब समय मिले नोट करते चलें और रात को सोने से पहले दिन भर में लिखे हुए को देखें, अध्ययन करें और परीक्षण करें, बिना किसी पूर्व निर्णय, बिना किसी आलोचना या प्रशंसा के, इससे आप अपने छिपे हुए विचारों, अहसासों, ईच्छाओं और अपने शब्दों के अर्थों को खोज पाएंगे।
अब इस अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जो भी आपने लिखा है अपनी स्वयं की बुद्धिमत्ता समझ से अपनी अवधान अवस्था को देख पायेंगे। इस आत्म अवधान आत्म ज्ञान की लौ में आप अपने द्वंद्वों के कारणों को खोज पाएंगे कारण मिलते ही द्वंद्व विलीन भी हो जाते हैं। आप अपने विचारों अपने अनुमान से एक दो बार नहीं कई दिनों तक विचारों, अहसासों, अपने आशयों प्रतिक्रियाओं को लिखने का सिलसिला जारी रख सकते हैं तब तक जब तक कि आप इनके पैदा होते ही तुरत ही इन्हें देखने की अवधानपूर्ण अवस्था में न आ जाएं।
ध्यान ऐसी ही सतत अवधानपूर्ण अवस्था है आत्मबोध की और आत्म से निरपेक्ष बोध की। ध्यान, सुविचारों से परे की अवस्था है, जहां अक्षोभ प्रशांत विवेक का उदय होता है और इसमें ही सर्वोच्च की धीरता का यथार्थ सामने आता है।

Sunday, 21 December 2008

निहायत आदते हैं, वक्त सी बदल जाने की जरूरत है

सदियों की रंजिशों को पल में भुलाने की जरूरत है
इंसानियत के हुनर को फिर से आजमाने की जरूरत है
बहुत हुए काबे में हज, बहुत हुए काशी में बड़े बड़े यज्ञ
हर हिन्दू को काबे में झुकने, हर मुस्लिम को गंगा नहाने की जरूरत है
न उसे ईसाई में बदलो, न बदलो हिन्दु मुस्लिम में
एक इंसान को इंसान सा खिल जाने की जरूरत है
बदलो गुरूद्वारे मंदिरों को, बदल दो मस्जिदों चर्चों को
शहर में लाखों इंसानों को ठिकाने की जरूरत है
हाथ की छोटी बड़ी उंगलियों से कुछ जुदा काम हैं उसके
मन के छोटे झरोखे से कुछ बड़ा दिखाने की जरूरत है
ये जो फर्क से दिखते हैं तेरे मेरे जीने में
निहायत आदते हैं,वक्त सी बदल जाने की जरूरत है

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चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

अपनी आँखों से देखा सुना ही सत्य नहीं होता

राम निरंजन न्यारा रे! अंजन सकल पसारा रे।।
अंजन उत्पत्ति वो ऊँकार। अंजन मांडया सब बिस्तार।।
अंजन ब्रह्मा शंकर इंद्र। अंजन गोपियों संग गोबिन्द।।
अंजन वाणी अंजन वेद। अंजन कीया नाना भेद।।
अंजन विद्या-पाठ-पुराण। अंजन फोकट कथहि ज्ञान।।
अंजन पाती अंजन देव। अंजन की करै अंजन सेव।।
अंजन नाचै अंजन गावे। अंजन भेष अनंत दिखावै।।
अंजन कहौं कहां लग केता। दान पुनि तप तीरथ जेता
कहै कबीर कोई बिरला जागै। अंजन छाड़ि निरंजन लागै।
अंजन आवै अंजन जाई। निरंजन सब घटि रह्यो समाई।।
जोग ध्यान तप सबै बिकार। कहै कबीर मेरे राम आधार।।

आँखों को दिखते दृश्य सा वो सब ओर फैला हुआ है, पर आँखों को न दिखने वाले उस अदृश्य की बातें ही न्यारी हैं। ऊँकार के रूप में उसका ही जन्म है और सारे दृश्य उसी का विस्तार हैं। ब्रह्मा, शंकर, इन्द्र और गोपियों के संग नाचता हुआ गोविन्द भी वही है। वह वाणी और वेद ज्ञान के रूप में प्रकट है। और चूंकि वह दिखता है इसलिए ज्ञान कई तरह के भेद भिन्नताओं को पैदा करता है। दृश्य ही वेदपुराणों, पुरानी किताबों, विद्या अध्ययन और नई पुरानी बातों को पढ़सुनकर फोकट में एक दूसरे को प्रभावित करने की कोशिश में लगा है। जो दिख रहा है वही देवता बनाता है और जो दिख रहा है वही अपनी रचनाओं - देवी देवताओं की सेवा करता है। वही नाचता और गाता है और अनन्त अनेकों रूप दिखाता है। दिखने वाला ही पूछता है कि ईश्वर कहां है, ईश्वर की खोज करता है। दिखने वाला ही बार-बार तप तीर्थों में जाकर दान पुण्य कार्यों में लगा रहता है। कबीर जी कहते हैं कि कोई विरला ही जागता है और दिखने वाली बातों को छोड़कर अदृश्य में प्रवृत्त होता है। जो दिखता है वो आता है और चला जाता है। जो नहीं दिखता, अदृश्य है - वो सब में समाया हुआ, न आता है न जाता है। योग ध्यान तप ये सब दोष हैं विकार हैं। और कबीर का वही अदृश्य राम आधार है।


दृश्य दिखने करने वाली बातों से ही आज की हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई वाली समस्याएं पैदा हुई हैं। मुसलमानियत की भी शुरूआत तो यहीं से होती है कि एक आदमी चुपचाप बैठा हुआ अपने अंदर कुछ पा जाता है, साथ वालों को यह कहता है कि बुत परस्त मन बनना। शायद उसकी मंशा हो कि जो दिख रहा है वहीं तक मत रूक जाना। तो बातें अलिखित मौखिक कहीं जाएं या लिखित में दी जाएं, जब गलत आदमी सामने बैठा हो तो गलत चीज ही फैलती हैं। बातों को किताब कुरान बनाया जाता है, जैसे वेद लिखे गये। शब्दों को सजाया जाता है, जैसे देवी देवताओं को सजाते हैं (कुरान की आयतों को सजाते हुए लिखना एक विशिष्ट कला है) मस्जिदों के विशिष्ट वास्तु ढांचे होते हैं, मंदिरों की तरह। यानि फिर वही बुतपरस्ती एक नये रूप में की जाती है। गुरूनानक जी विभिन्न साधु संतों की वाणी को जीवन में मार्गदर्शक बनाने को कहा - तो वाणियों का गान ही शुरू हो गया। एक नई दुकान खुल गई रागी जत्थे बन गये। ग्रंथों की पूजा शुरू हो गई। ग्रन्थ साहिब हो गये हलुए-खीर का भोग गं्रथों को ही लगने लगा। गुरूग्रन्थ साहिब में गुरूनानक ने जितने संतों की वाणियों को एकत्रित किया उसके बाद काम ही रूक गया। क्या उसके बाद साधु संत पैदा होने बंद हो गये? गुरूगं्रथ साहिब एक शैली थी- बुद्धपुरुषों की वाणियों को संकलित करने की। पर फिर सब ठहर गया। बुद्ध और महावीर ने भी मना किया था मूर्ति पूजा के लिए लेकिन जितनी भगवान बुद्ध की मूर्तियां दिखती हैं किसी देवी देवता की नहीं। महावीर की निर्दोष र्निवस्त्रता भी सम्प्रदाय बन गई। मूर्खता ये कि एक महावीर नंगे और एक सफेद कपड़ों में।
आदमी का मन अतीत ही है। तो वो आदमी या अन्य रूपों में नित नूतन नित्य हर क्षण परमात्मा के ताजा नये रूप में हर क्षण खिले पुष्प को देख समझ ही नहीं पाता, या समझना ही नहीं चाहता। समझने में असुविधा ये है कि झुंड के अहंकार का आनंद नहीं मिल पाता। क्योंकि धर्म परमात्मा ईश्वर सर्वप्रथम नितांत वैयक्तिक चीज है अपनी आत्मा की अदृश्यता में फूटी कोंपल सी जो समाज, और धरती ग्रह और सारे ब्रह्माण्ड तक फैलती है।
सम्प्रदाय में तुरंत झंुड की ताकत महसूस होती है एक हिन्दू का अहंकार टूटता है तो सौ हिन्दु इकट्ठा हो जाते हैं एक मुसलमान को गाली दो दंगे हो जाते हैं। तो शक्ति को इस तरह विकृत निकृष्ट रूप में महसूस करने का ढंग हैं सम्प्रदाय, हिन्दू मुस्लिमों के झुण्ड। आदमी अपनी आदिम प्रकृति के अनुसार झुण्डों में रहता है। प्रकृति वही आदिम है पर अब पढ़ा लिखा आदमी है। सब नये तरीके से करता है - हिन्दू संगठन हैं, मुस्लिम संगठन हैं लड़ने मरने के नये हथियार और नयी जगहें हैं शहर हैं। परमाणु बम है। न्यूयार्क की तनी इमारते हैं ताज होटल हैं।
धर्म जीवन की बहती हुई नदी है। लेकिन क्या आदमी कुंए के मेंढ़क सा रहना नहीं चाहता? तो फिर क्यों कुंए बनाता है - एक हिन्दुत्व का कुंआ, एक मुसलमानियत, एक ईसाईओं का कुंआ, एक सिखों का कुंआ। इनमें सब तय होता है कि किसने क्या कह दिया और उसे क्या मानना है। कि कब हंसना है रोना है। कब कौन सी जन्मतिथि या मरण तिथि किस ढंग से मनानी है। कौन से भजन गाने कव्वालियां नये नये अंदाज में गानी हैं और उनके अर्थ समझने की कोशिश कभी नहीं करनी है। तुलसीदास की रामायण को पागलों की तरह चीख-चीख कर गाते शोर फैलाते देखा जा सकता है। प्रतियोगिता होती है कि इतने दोहे इतने घंटों में खत्म कर देने हैं कई माहिर जत्थे हैं। आराम से पवित्र दिन संडे को या किसी भी रात को किसी भी मोहल्ले को वैध ढंग से परेशान किया जा सकता है। हद है दीपावली के पटाखों का धुंआ - अस्थमा के रोगियों को मर जाना चाहिए या हिन्दुस्तान से बाहर चले जाना चाहिए दीपावली के दिन। क्या यही तरक्की है- धुआं रहित पटाखे नहीं बनाये जा सकते, आयुर्वेदिक रंग नहीं बन सकते। होली के रासायनिक रंगो की जलन मुझे साल में एक और दिन घर मंे बंद रहने को कहती है और रंगों के एक त्यौहार में खुश रहने से मरहूम करती है। अब भी मुर्हरम को मातम बनाने, खुल्लम खुला रोना पीटना क्या पागलपन है। जीसस को क्रूस पर चढ़ने में हुए दर्द का पता नहीं पर टीवी पर देखो सुनोे कई आदमी खुद हर साल क्रूस पर चढा़ते हैं, इसमें क्या मजा है? मजा वही है भीड़ आपको, अहंकार को पोषित करती है। आज भी आदिम प्रवृत्तियां काम कर रही हैं। बामियान में बुद्ध की प्रतिमाएं तोड़ दी गईं। अमरीकी सैनिकों ने बंदी ईराकी सैनिकों को कौन सी यातनाएं थीं जो नहीं दी? कौन सा पैशाचिक आनंद उन्होंने नहीं लिया? बुश पर जूता पड़ा और खिसियाहट में छद्म सभ्य वाक्यों से माहौल को हल्का करने की, अपनी आदिम प्रकृति को दबाने की कोशिश की। माहौल तो ऐसे हल्का होता कि बुश अपने अंगरक्षकों को मना कर उस पत्रकार की जूतमपैजार का जवाब खुद उस पर जूते फेंक कर, सहज अपने मुंह से निकली गालियां बक कर देते। इससे ये तो साबित होता कि बुश नाम का एक सरल सहज-सा आदिम मानव तो उनमें जिंदा है, जिसके सभ्य होने की गंुजाइशें हैं। पर पुलसियों से उस पत्रकार की बाहें और अंतड़ियां तुड़वा बुश ने साबित किया कि वो वही आधुनिक युग के आदिम मानव हैं जिसकी बर्बरता युगों के साथ बढ़ती गई है।
धर्मनिरपेक्षता एक निरर्थक शब्द है। सब धर्म सापेक्ष हो रहा है हिन्दू बिल, मुस्लिम बिल, अल्पसंख्यकों के विशेष कानून लिखित में हैं। साम्प्रदायिकता को कानूनसम्मत, लिखित में जोर शोर से बढ़ावा दिया, पाला पोसा जा रहा है। कानूनसम्मत सिमी, विश्वहिन्दू परिषद की तरह सिख, जैन, ईसाई सभी सम्प्रदायों के सभी तरह के सक्रिय संगठन हैं। सर्वधर्म समितियां दंगों के बाद फैले धुंए सी नजर आती हैं। आपका धर्म कुंए का कीचढ़ है और सर्वधर्म का मतलब चार पांच कुओं का कीचढ़ एक कर दो तो क्या वो साबर बन जायेगा, नदी के बहते पानी सा पवित्र हो जायेगा? एक गलती किसी को सदियों तक दबाया कुचला, कमजोर बनाया। दूसरी गलती आरक्षण की बैसाखी दे दी। क्या इससे दबे कुचले लोग अपने पांव पर चलना सीख जायेंगे, ताकतवर हो जायेंगे।

कबीर के निरंजन राम को समझने की बहुत जरूरत है। नितांत वैयक्तिक, धर्म के विशुद्ध अदृश्य रूप को सर्वप्रथम खुद में महसूस करने और उसके अंकुरित-पुष्पित-पल्लवित स्वरूप, उसकी सुगंध को प्रत्येक जड़ चेतन की आत्मा तक ले जाने की जरूरत है। ‘जो दिख रहा है’ उसके सच को ‘जो नहीं दिख रहा’ उसके द्वारा समझने की जरूरत है।
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