सब का सब दोहराव है
सारा जन्म - सारे जन्म
जरूरी नहीं है
रोज पहरों के लिए
स्कूल जाना 12 - 15 साल तक
पर सभी जा रहे हैं आज तक
जरूरी नहीं है
कि एक अजनबी आदमी, अजनबी औरत से शादी करें
पर अरबों लोग कर रहे हैं खुशी खुशी
जरूरी नहीं कि
बच्चे भी पैदा हों
पर हर मिनट हो रहे हैं लाखों बच्चे
जरूरी नहीं है कि
बरसों तक नौकरी की जाये
8-10-12 घंटे एक आदमी
किसी दूसरे आदमी की चाकरी करे
काम हो या, न हो
किसी ठिये पर टिके घंटों तक
ऊंघता हुआ
टाईम पास करता हुआ
पर दुनियां के कई अरब आदमी ऐसा कर रहे हैं
कितनी बेहूदा और फिजूल सी बातें
कितनी तन्मयता से
जन्मों जन्मों की जाती हैं
मशीन की तरह
और कितनी जरूरी बातें
कि पड़ोसी का हाल चाल पूछ लें
शहर के तालाब में आये
नये पक्षियों की चाल ढाल की सूझ लें
बहुत दिन से गिटार नहीं बजाया, बजा लें
बहुत दिन हुए कोई गीत नहीं गुनगुनाया, गुनगुना लें
बहुत दिन हुए चुपचाप नहीं बैठे
धूप की गरमाहट को महसूस करें लेटे लेटे
मौसी से मिलने नहीं गये कितने बरस से
दोस्त को मिलने को, गये हैं तरस से
बस
संडे के संडे जीते हैं थोड़ा सा
हफ्ते भर का पारा नीचे उतरता है थोड़ा सा
और एक बरस और एक जिन्दगी में
क्या आपको बस रविवार
या छुट्टियों को ही जीना है?
बाकी छः दिन किस मजबूरी में
किसकी जी हुजूरी में गुजारने हैं
क्या इस तरह ही लम्हें संवारने हैं
क्या कामचलाऊ रोटी कपड़े मकान में काम नहीं चल सकता
क्या सांसों का उबलना, सुकून में नहीं ढल सकता
क्या ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, दिल की बीमारियों का फैशन है
क्या ये जन्म टेंशन, कैंसर, एड्स का सैशन है
क्या नोट ही जिन्दगी हैं?
क्या स्वार्थ ही बन्दगी है?
क्या नोट बिना आपके व्यक्तित्व में कुछ भी नहीं बचा
क्या नोट की चैंधियाहट से रोम-रोम है रचा पचा
क्या हालात इतने बुरे हैं कि सब तरफ प्रतियोगी-छुरे हैं
क्या दौड़ से हट जाना हार है
क्या दौड़ ही संसार है
......निरंतर... शीघ्र ही
Thursday, 11 December 2008
Wednesday, 10 December 2008
पूरनचंद प्यारेलाल का एक गीत
रब बंदे दी जात इक्को
ज्यों कपड़े दी जात है रूं
कपड़े विच ज्यों रूं है लुकया
यूं बंदे विच तू
आपे बोलें आप बुलावे
आप करे हूँ हूँ
तू माने या न माने दिलदारा
असां ते तेनू रब मनया
दस होर केडा रब दा दवारा
असां ते तेनू रब मनया
अपने मन की राख उड़ाई
तब ये इश्क की मंजिल पाई
मेरी साँसों का बोले इकतारा
तुझ बिन जीना भी क्या जीना
तेरी चैखट मेरा मदीना
कहीं और न सजदा गवारा
हँसदे हँसदे हर गम सहना
राजी तेरी रजा में रहना
तूने मुझको सिखाया ये यारा
अर्थात् परमात्मा ओर आत्मा की एक ही जात है। जैसे कपड़े में रूई छुपी है वैसे ही आत्मा में परमात्मां। वो आप ही कहता है आप ही सुनता है आप ही होने की हामी भी भरता है।
तू माने या न माने हमने तुझे रब/ईश्वर मान लिया है तू ही बता और अब कौन से द्वार पर जायें।
अपने मन को राख की तरह बना उड़ा दिया है तब हमने इश्क की यह मंजिल पाई है मेरे सांसों का इकतारा तेरी ही धुन निकालता है।
हंसते हंसते खुशी गम सहना, तेरी मर्जी की मुताबिक रहना ये तूने ही मुझे सिखा दिया है।
ज्यों कपड़े दी जात है रूं
कपड़े विच ज्यों रूं है लुकया
यूं बंदे विच तू
आपे बोलें आप बुलावे
आप करे हूँ हूँ
तू माने या न माने दिलदारा
असां ते तेनू रब मनया
दस होर केडा रब दा दवारा
असां ते तेनू रब मनया
अपने मन की राख उड़ाई
तब ये इश्क की मंजिल पाई
मेरी साँसों का बोले इकतारा
तुझ बिन जीना भी क्या जीना
तेरी चैखट मेरा मदीना
कहीं और न सजदा गवारा
हँसदे हँसदे हर गम सहना
राजी तेरी रजा में रहना
तूने मुझको सिखाया ये यारा
अर्थात् परमात्मा ओर आत्मा की एक ही जात है। जैसे कपड़े में रूई छुपी है वैसे ही आत्मा में परमात्मां। वो आप ही कहता है आप ही सुनता है आप ही होने की हामी भी भरता है।
तू माने या न माने हमने तुझे रब/ईश्वर मान लिया है तू ही बता और अब कौन से द्वार पर जायें।
अपने मन को राख की तरह बना उड़ा दिया है तब हमने इश्क की यह मंजिल पाई है मेरे सांसों का इकतारा तेरी ही धुन निकालता है।
हंसते हंसते खुशी गम सहना, तेरी मर्जी की मुताबिक रहना ये तूने ही मुझे सिखा दिया है।
Tuesday, 9 December 2008
महामना जे. कृष्णमूर्ति जी के आज के उद्धरण का अनुवाद
एक धार्मिक व्यक्ति वो व्यक्ति नहीं जो भगवान को ढूंढ रहा है। धार्मिक आदमी समाज के रूपांतरण से संबद्ध है, जो कि वह स्वयं है। धार्मिक आदमी वो व्यक्ति नहीं जो असंख्य रीति रिवाजों - परंपराओं को मानता/करता है। अतीत की संस्कृति, मुर्दा चीजों में जिंदा रहता है। धार्मिक आदमी वो व्यक्ति नहीं है जो निर्बाध रूप से बिना किसी अंत के गीता या बाईबिल की व्याख्या में लगा हुआ है, या निर्बाध रूप से जप कर रहा है, सन्यास धारण कर रखा है - ये सारे तो वो व्यक्ति हैं जो तथ्य से पलायन कर रहे हैं, भाग रहे हैं। धार्मिक आदमी का संबंध कुल जमा, संपूर्ण रूप से समाज को जो कि वह स्वयं ही है, को समझने वाले व्यक्ति से है। वह समाज से अलग नहीं है। खुद के पूरी तरह, संपूर्ण रूप से रूपांतरण अर्थात् लोभ-अभिलाषाओं, ईष्र्या, महत्वाकांक्षाओं के अवसान द्वारा आमूल-रूपांतरण और इसलिए वह परिस्थितियों पर निर्भर नहीं, यद्यपि वह स्वयं परिस्थितियों का परिणाम है - अर्थात् जो भोजन वह खाता है, जो किताबें वह पढ़ता है, जो फिल्में वह देखने जाता है, जिन धार्मिक प्रपंचों, विश्वासों, रिवाजों और इस तरह के सभी गोरखधंधों में वह लगा है। वह जिम्मेदार है, और क्योंकि वह जिम्मेदार है इसलिए धार्मिक व्यक्ति स्वयं को अनिवार्यतः समझता है, कि वो समाज का उत्पाद है समाज की पैदाईश है जिस समाज को उसने स्वयं बनाया है।इसलिए अगर यथार्थ को खोजना है तो उसे यहीं से शुरू करना होगा। किसी मंदिर में नहीं, किसी छवि से बंधकर नहीं चाहे वो छवि हाथों से गढ़ी हो या दिमाग से। अन्यथा कैसे वह कुछ खोज सकता है जो संूपर्णतः नया है, यथार्थतः एक नयी अवस्था है.
क्या हम खुद में धार्मिक मन की खोज कर सकते हैं। एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में वास्तव में वैज्ञानिक होता है। वह अपनी राष्ट्रीयता, अपने भयों डर, अपनी उपलब्धियों से गर्वोन्नत, महत्वाकांक्षाओं और स्थानिक जरूरतों के कारण वैज्ञानिक नहीं होता। प्रयोगशाला में वह केवल खोज कर रहा होता है। पर प्रयोगशाला के बाहर वह एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही होता है अपनी पूर्वअवधारणाओं, महत्वाकांक्षाओं, राष्ट्रीयता, घमंड, ईष्र्याओं और इसी तरह की अन्य बातों सहित। इस तरह के मन की पहुंच ‘धार्मिक मन’ तक कभी नहीं होती। धार्मिक मन किसी प्रभुत्व केन्द्र से संचालित नहीं होता, चाहे उसने पारंपरिक रूप से ज्ञान संचित कर रखा हो, या वह अनुभव हो (जो कि सच में परंपराओं की निरंतरता, शर्तों की निरंतरता ही है।) पंरपरा यानि शर्त, आदत।
धार्मिक सोच, समय के नियमों के मुताबिक नहीं होती, त्वरित परिणाम, त्वरित दुरूस्ती सुधराव सुधार समाज के ढर्रों के भीतर। धार्मिक मन रीति रिवाजी मन नहीं होता वह किसी चर्च-मंदिर-मस्जिद-गं्रथ, किसी समूह, किसी सोच के ढर्रे का अनुगमन नहीं करता।धार्मिक मन वह मन है जो अज्ञात में प्रवेश करता है और आप अज्ञात में नहीं जा सकते, छलांग लगा कर भी नहीं। आप पूरी तरह हिसाब लगाकर बड़ी सावधानीपूर्वक अज्ञात में प्रवेश नहीं कर सकते। धार्मिक मन ही वास्तव में क्रांतिकारी मन होता है, और क्रांतिकारी मन ‘जो है’ उसकी प्रतिक्रिया नहीं होता। धार्मिक मन वास्तव में विस्फोटक ही है, सृजन है। और यहां शब्द ‘सृजन’ उस सृजन की तरह न लें जिस तरह कविता, सजावट, भवन या वास्तुशिल्प, संगीत, काव्य या इस तरह की चीजें। ये सृजन की एक अवस्था में ही हैं।
क्या हम खुद में धार्मिक मन की खोज कर सकते हैं। एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में वास्तव में वैज्ञानिक होता है। वह अपनी राष्ट्रीयता, अपने भयों डर, अपनी उपलब्धियों से गर्वोन्नत, महत्वाकांक्षाओं और स्थानिक जरूरतों के कारण वैज्ञानिक नहीं होता। प्रयोगशाला में वह केवल खोज कर रहा होता है। पर प्रयोगशाला के बाहर वह एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही होता है अपनी पूर्वअवधारणाओं, महत्वाकांक्षाओं, राष्ट्रीयता, घमंड, ईष्र्याओं और इसी तरह की अन्य बातों सहित। इस तरह के मन की पहुंच ‘धार्मिक मन’ तक कभी नहीं होती। धार्मिक मन किसी प्रभुत्व केन्द्र से संचालित नहीं होता, चाहे उसने पारंपरिक रूप से ज्ञान संचित कर रखा हो, या वह अनुभव हो (जो कि सच में परंपराओं की निरंतरता, शर्तों की निरंतरता ही है।) पंरपरा यानि शर्त, आदत।
धार्मिक सोच, समय के नियमों के मुताबिक नहीं होती, त्वरित परिणाम, त्वरित दुरूस्ती सुधराव सुधार समाज के ढर्रों के भीतर। धार्मिक मन रीति रिवाजी मन नहीं होता वह किसी चर्च-मंदिर-मस्जिद-गं्रथ, किसी समूह, किसी सोच के ढर्रे का अनुगमन नहीं करता।धार्मिक मन वह मन है जो अज्ञात में प्रवेश करता है और आप अज्ञात में नहीं जा सकते, छलांग लगा कर भी नहीं। आप पूरी तरह हिसाब लगाकर बड़ी सावधानीपूर्वक अज्ञात में प्रवेश नहीं कर सकते। धार्मिक मन ही वास्तव में क्रांतिकारी मन होता है, और क्रांतिकारी मन ‘जो है’ उसकी प्रतिक्रिया नहीं होता। धार्मिक मन वास्तव में विस्फोटक ही है, सृजन है। और यहां शब्द ‘सृजन’ उस सृजन की तरह न लें जिस तरह कविता, सजावट, भवन या वास्तुशिल्प, संगीत, काव्य या इस तरह की चीजें। ये सृजन की एक अवस्था में ही हैं।
Sunday, 7 December 2008
क्या फर्क है?
क्या फर्क है?
कि एक - सिगरेट न देने पर कोई किसी को छुरा मार दे
और दूसरा -
पानी, तेल, जमीन,
धर्म, सरकार, या किसी भी हवस में
बम धमाके करे - हजारों मरें
आतंक तो है न
क्या फर्क है?
कि कोई चपरासी 10 रू रिश्वत की मांग करे
या कोई मंत्री करोड़ों का टेंडर अपनों के नाम करे
भ्रष्टाचार तो है न
क्या फर्क है?
किसी भी नेता में -
धार्मिक-अधार्मिक, राजनीतिक-आतंकी,
सामाजिक-असामाजिक।
आदमी को मोहरा तो समझते हैं न
जरूरत है सभी जगह
राजनीतिक सामाजिक धार्मिक या कोई भी
कोई भी सांचा हो - तोड़ा जाये
खांचों में फिट होने के लिए नहीं है आदमी
कि एक - सिगरेट न देने पर कोई किसी को छुरा मार दे
और दूसरा -
पानी, तेल, जमीन,
धर्म, सरकार, या किसी भी हवस में
बम धमाके करे - हजारों मरें
आतंक तो है न
क्या फर्क है?
कि कोई चपरासी 10 रू रिश्वत की मांग करे
या कोई मंत्री करोड़ों का टेंडर अपनों के नाम करे
भ्रष्टाचार तो है न
क्या फर्क है?
किसी भी नेता में -
धार्मिक-अधार्मिक, राजनीतिक-आतंकी,
सामाजिक-असामाजिक।
आदमी को मोहरा तो समझते हैं न
जरूरत है सभी जगह
राजनीतिक सामाजिक धार्मिक या कोई भी
कोई भी सांचा हो - तोड़ा जाये
खांचों में फिट होने के लिए नहीं है आदमी
Wednesday, 26 November 2008
अगर ये आखिरी पल हों
जब
आपको बहुत दिनों से लग रहा हो
कि तबियत आजकल ख़राब रहती है
शायद अब मौत आने ही वाली है
और दो तीन दिन
लगातार ऐसा लगे ---
और फ़िर एक दिन पक्का सा लगे
कि आज आखिरी दिन ही है
तो इस आखिरी दिन
आप अपनी जिन्दगी के आखिरी दिन क्या करेंगे?
जनाब
ज्यादा सोचने की जरूरत नही है
क्योंकि आपने जिन्दगी के बारे में
इतने बरसों तक बहुत ज्यादा नही सोचा
और सोचा भी, तो कुछ नही किया
इन आखिरी दिनों में भी
आपने बस कयास ही लगाए
जिन्दगी को कुछ ख़ास नही दिया
कुछ ख़ास नही किया
जनाब
यदि मौत में और आपमें
अभी भी फासला है
तो क्या आपको
आदतों से आजाद नही होना है
आपको मौत के दिन तक भी
क्या अंदाजे ही लगाने हैं?
आदत अच्छी हो या बुरी
आदत है
अच्छे खासे आदमी को
मशीन बना देती है
और क्या आप मशीन बन कर मरना पसंद करेंगे?
आपको बहुत दिनों से लग रहा हो
कि तबियत आजकल ख़राब रहती है
शायद अब मौत आने ही वाली है
और दो तीन दिन
लगातार ऐसा लगे ---
और फ़िर एक दिन पक्का सा लगे
कि आज आखिरी दिन ही है
तो इस आखिरी दिन
आप अपनी जिन्दगी के आखिरी दिन क्या करेंगे?
जनाब
ज्यादा सोचने की जरूरत नही है
क्योंकि आपने जिन्दगी के बारे में
इतने बरसों तक बहुत ज्यादा नही सोचा
और सोचा भी, तो कुछ नही किया
इन आखिरी दिनों में भी
आपने बस कयास ही लगाए
जिन्दगी को कुछ ख़ास नही दिया
कुछ ख़ास नही किया
जनाब
यदि मौत में और आपमें
अभी भी फासला है
तो क्या आपको
आदतों से आजाद नही होना है
आपको मौत के दिन तक भी
क्या अंदाजे ही लगाने हैं?
आदत अच्छी हो या बुरी
आदत है
अच्छे खासे आदमी को
मशीन बना देती है
और क्या आप मशीन बन कर मरना पसंद करेंगे?
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Tuesday, 25 November 2008
मतदान करना?, नही करना?
मत दान करो
अपना बहुमूल्य मत
कम बुरे आदमी को
आपके मत का मतलब है
कि
उसके हर अच्छे बुरे फैसले में
उसके साथ हैं आप
आने वाले पाँच साल तक
और बुरा आदमी
अगले पाँच सालों में
हजारों गुना बुरा हो सकता है
एक नई आबादी बनाओ
जो हट के है
नेता और जनता
अमीर गरीब
के बँटवारे से
एक ऐसी आबादी
जो रोटी और परमाणु बोम्ब में
प्राथमिकता तय कर सके
कि
क्या उगाना है
एक ऐसी आबादी
जिसमे नेता चुनने के लिए
पाँच साल का इंतज़ार नही करना पड़ता
हर काम के अंजाम के बाद
नेता रहता है या नही रहता ....तय करना आसान हो
एक ऐसी आबादी
जिसमे
हर आदमी को पता हो
कि किसकी जायज भूख को
पूरा होना है कब
अपना बहुमूल्य मत
कम बुरे आदमी को
आपके मत का मतलब है
कि
उसके हर अच्छे बुरे फैसले में
उसके साथ हैं आप
आने वाले पाँच साल तक
और बुरा आदमी
अगले पाँच सालों में
हजारों गुना बुरा हो सकता है
एक नई आबादी बनाओ
जो हट के है
नेता और जनता
अमीर गरीब
के बँटवारे से
एक ऐसी आबादी
जो रोटी और परमाणु बोम्ब में
प्राथमिकता तय कर सके
कि
क्या उगाना है
एक ऐसी आबादी
जिसमे नेता चुनने के लिए
पाँच साल का इंतज़ार नही करना पड़ता
हर काम के अंजाम के बाद
नेता रहता है या नही रहता ....तय करना आसान हो
एक ऐसी आबादी
जिसमे
हर आदमी को पता हो
कि किसकी जायज भूख को
पूरा होना है कब
एक ऐसी आबादी
जिसमे आदमी को "आबादी " न कहा जाए
Friday, 14 November 2008
घर ही नहीं
रोज़ झाडू पोंछा लगाना चाहिए
अक्ल के तहखानों में
जरा मुश्किल है
क्यों कि हर दिन
हम बे खबर होते हैं
रात आती है aन्धेरा होता है
और
रोज़ बन जाते है
नए तहखाने
रोज़ ८ - १० घंटे घर के बाहर भी बिताना जरूरी है
कि हमें खबर रहे
अब हम पत्थर के जन्म को
पार कर आये हैं
और चल फिर सकतें हैं
चाँद तक
हर घडी याद रहना चाहिए
कि हम जिन्दा है
आदमी हैं
और होश रखते है
और खुदा आकाश में ही नहीं
हमारी जड़ों में भी है
रोज़ झाडू पोंछा लगाना चाहिए
अक्ल के तहखानों में
जरा मुश्किल है
क्यों कि हर दिन
हम बे खबर होते हैं
रात आती है aन्धेरा होता है
और
रोज़ बन जाते है
नए तहखाने
रोज़ ८ - १० घंटे घर के बाहर भी बिताना जरूरी है
कि हमें खबर रहे
अब हम पत्थर के जन्म को
पार कर आये हैं
और चल फिर सकतें हैं
चाँद तक
हर घडी याद रहना चाहिए
कि हम जिन्दा है
आदमी हैं
और होश रखते है
और खुदा आकाश में ही नहीं
हमारी जड़ों में भी है
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