Thursday, 28 May 2009

A Ajnabi in 1963

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूं दिल नवाजी की
न तुम मेरी तरफ देखो गलत अंदाज नजरों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों में
न जाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज नजरों से
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराये हैं
मेरे हमराह भी रूसवाईयां है मेरे माजी की
तुम्हारे साथ भी गुजरी हुई रातों के साये हैं
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

तार्रूफ रोग हो जाए - तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाए - तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

फिल्म गुमराह (1963)
Audio Video: http://www.youtube.com/watch?v=cE5q9kst-Zc

A Old Ajnabi Song in new Way

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों
न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूं दिल नवाजी की
न तुम मेरी तरफ देखो गलत अंदाज नजरों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों में
न जाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज नजरों से
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराये हैं
मेरे हमराह भी रूसवाईयां है मेरे माजी की
तुम्हारे साथ भी गुजरी हुई रातों के साये हैं
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

Hear : http://www.youtube.com/watch?v=nLCD9wk4Znw
Original : http://www.youtube.com/watch?v=cE5q9kst-Zc

Tuesday, 19 May 2009

बीज की संभावनाएं

खुद से ही अजनबी

पूछता हूँ दूजों से
जानना चाहता हूं दूजों से
कि मैं कौन हूं

और मैं ढूंढता हूं
लोगों के जवाबों मेें
कि मैं क्या हूं

मैं खुद से क्यों नहीं मिल लेता
आमने सामने

क्यों मैं बुनता हूं खुद ही
खुद से दुराव-छुपाव

क्यों किये जाते हैं ....
मिलने के लिए
किसी खुदा....
बिचैलियों, ख्यालों, सपनों के बहाने

क्यों हूं मैं,
अपनी ही आशाओं इच्छाओं का गुलाम?

क्यों बांध लिया है
मैंने खुद को
दूजों के छोड़े, दिये रस्सों से
क्यों खरीद ली हैं मैंनंे
अपनी लिये भांति भांति की जंजीरे

क्यों मुझे पता ही नहीं चलतीं
पिंजरे की सीमाएं
क्यों नहीं सूझता
बेड़ियों का भार

क्यों मेरे पंख
वक्त के गुलाम हो गये

क्यों परिधियों, व्यासों, त्रिज्याओं का गणित
मौत तक घसीटे ले जा रहा है

क्या मेरे सारे प्रश्न
दूजों के पढ़े हुए
कृत्रिम हैं
कविता हैं मनोरंजन हैं
खुद से छलावा हैं

या प्रश्नहीन है मेरी चेतना की धरती
आलस्य उन्माद का रेगिस्तान
खा चुका है मुझ बीज की संभावनाएं

Wednesday, 13 May 2009

Selected Hindi Jokes

तूफान तेज़ी पर था। बडी हवेली की खिडकियां जोर-जोर से खड्खडा रही थी। एक बूडा नौकर मेहमान को शयनकक्ष की तरफ ले जा रहा था। रहस्यमय और भयानक वातावर्ण से डरे हुए मैहमान ने बूडे नौकर से पूछा, क्या इस कमरे मे कोई अप्रत्याशित घटना घटी है?"
"चालीस साल से तो नही।" नौकर ने जवाब दिया।

आशवस्त होते हुए मेहमान ने पूछा, " चालीस साल पहले क्या हुआ था?" बूडे नौकर के आखों मे चमक पैदा हुई और वह फुसफुसाते हुए बोला,

"एक आदमी सारी रात इस कमरे मे ठहरा था और सुबह बिल्कुल ठीक ठाक उठा
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सवाल - सरदारजीको कन्फ्यूज कैसे करे ?

जवाब - सिम्पल... उसे एक गोल कमरेमे ले जावो और एक कोने मे बैठनेके लिए कहो.
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एक व्यक्ति की अपने तोते से तबियत भर गई। उस ने उसे निलाम किया। बोली १०० रुपये पर छुटी।
खरीददार मुस्करार कहने लगा, "खैर, ले लेता हूं लेकिन इतना बतादें कि यह बोलेगा भी?"

" अजी, यही तो आपके खिलाफ बोली बडा रहा था!"
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चंद्रभानजी की पत्नी को मनोवैज्ञानिक ने परामर्श दिया- 'आज रात जब वे शराब पीकर आए, तो उनसे नरमी और प्रेम से पेश आना।

आपका मधुर आचरण ही उनकी लत छुड़ा सकता है।'

रात होने पर चंद्रभानजी लड़खड़ाते हुए घर आए।

पत्नी ने बड़े प्यार से उनका कोट, जूते और मोजे उतारे और बोली- 'डार्लिंग, आओ सो जाएँ।'

चंद्रभानजी ने जरा झूमते हुए कहा- 'हाँ-हाँ,

घर जाकर तो चिड़चिड़ी बीवी की गुर्राहट ही सुननी है।
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रेलगाडी की बर्थ पर संदूक रख कर एक व्यक्ति बैठने लगा तो पास बैठी मोटी महिला बोली, " इसे यहां से हटा लो, कहीं मेरे उपर गिर गया तो?" यात्री लापरवाही से बोला, " कोई बात नही इस मे टूटने वाली कोई चीज नही है।"
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पत्‍नी अपने लिए बाज़ार से एक नई ड्रैस लेकर आई तो उस ड्रैस को देखकर पति गुस्से में बोला," यह तुम क्या पारदर्शी ड्रैस उठा लाई हो, इस मे तो आर- पार सब दिखाई देता है।" पत्‍नी मुस्कुराकर बोली, " आप भी बडे भोले हो, भला जब मैं इस ड्रैस को पहन लूंगी तो आर- पार क्या दिखाई देगा?"
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एक युवक अपनी प्रेमिका के लिए एक अंगूठी खरीदने के विचार से ज्यूलर के शोरुम मे गया। उसने शोकेस मे रखी अंगुठी के बारे मे पूछा, इस की क्या कीमत है?
पांच हजार रुपए, सेल्जमैन ने बताया।
इतनी अधिक कीमत सुन कर युवक के मुँह से सीटी निकल गई। फिर उसने एक अंगूठी की ओर इशारा करके पूछा, इसकी? दो सीटियां- उत्तर मिला ।
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दो दोस्त बाते कर रहे थे, उस मे से पहला बोला, कमाल है शादी के 25 सालो मे तुम्हारा एक बार भी अपनी पत्नी से झगडा नही हुआ, ऐसे कैसे हो सकता है।
दूसरा ऐसा ही है, दरसल शादी के दुसरे ही दिन हमने फैसला कर लिया था कि घर के सभी छोटे-छोटे फैसले वही करेगी और बडेबडे मै।
पहला- अच्छा,क्या इस मे भी कभी झगडा नही हुआ ?
पहला- नही, आज तक कोई बडा फैसला लेने की नौबत ही नही आई
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कम्पनी बाग मे कोने की एक बैंच पर बैठे प्रेमी प्रेमिका प्रेम वार्तालाप मे मग्न थे। एकाएक प्रेमिका ने स्वाल कर दिया," रमन सच-सच बताओ कि क्या तुम शादी के बाद भी मुझे इसी तरह प्यार करते रहोगे?" प्रेमी चहक कर बोला, "बल्कि इस से भी ज्यादा क्योकि शादी शुदा स्त्रियां मुझे पहले से ही बहुत पसंद रही है।
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मरते समय पति ने अपने पत्नी को सब कुछ सच बताना चाहा । उस ने कहा " मै तुम्हे जीवन भर धोखा देता रहा। सच तो यह है कि दर्जनो औरतों से मेरे नाजायज संबंध थे।"
पत्नी बोली, "मै भी सच बताना चाहूँगी । तुम बीमारी से नही मर रहे मैने तुम्हे धीरे-धीरे असर करने वाला जहर दिया है।
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Thursday, 16 April 2009

शीषर्क न दो

शीषर्क न दो
रहने दो वर्तमान को वर्तमान
न ढूंढो अतीत, भविष्य में कुछ समान
पियो पल-पल
किलकारियां मारती बहती नदी का जल
न बांधो अकाल को, न तोड़ो
बहती नदी के कूल न मोड़ो
छोड़ो राहों को उनकी राह पर
न पापरत होओ कुछ चाह कर
जियो अनिश्चितता को अज्ञात को
कौंधते सूरज स्याह रात को
न ढूंढो हल
है सच्चा ज्ञान
जो है, उसका वैसा का वैसा भान
पियो हर पल
अमृत मिले की गरल
अकाल में तैरते रहना
कुदरतन है सहज सरल

Monday, 13 April 2009

उम्मीद-ए-जिंदगी

ये जो उम्मीद-ए-जिंदगी है, गहरी जमी है क्या करूं?
समझाया दिल को सब सही है, पर कुछ कमी है, क्या करूं?
चलती सांसें शोर हैं, सब ओर सन्नाटों के शहर
आती नहीं वह भोर, किसका जोर, हाय क्या करूं?
इक झूठ-सा लगता है, रहना जंगलों में ‘सोच’ के
सच्चाईयां जिद पे अड़ीं, मुश्किल बड़ी है क्या करूं?
कहना बुरा सा लगता है पर घुंपा है दिल तक ये छुरा
डर है और धड़कन बढ़ी है, क्या घड़ी है? क्या करूं?

Friday, 6 February 2009

मिलारेपा का एक गीत

सुनो मेरे उदास दोस्त
इकट्ठा हुए कर्ज और सूद को चुकाने के दर्द सा
सबको जाना है मौत तक
यमदूत आते और ले जाते हैं।
जब मृत्यु आती है
अमीर नहीं खरीद सकता जीवन पैसे देकर
योद्धा नहीं रोक सकते तलवार से
न चतुरों की चतुराई ही काम करती है
न सुन्दर महिलाओं का सौन्दर्य ही रोक पाता है मौत का रास्ता
और सारे सीखे सिखाए पढ़े लिखे लोग भी
अपने सारे शब्दजाल और वाकपटुता से
मृत्यु को स्थगित नहीं कर पाते
बद्किस्मत यहां रो भी नहीं पाते
और साहसियों का साहस काम नहीं आता

जब देह में सारी सारी नाड़ियां टूट पड़ती हैं
और दो शिखरों के बीच में टूटता है कुछ
सारी दृश्य और संवेदन क्षमता मंद होती जाती है
सारे पंडे पुजारी और दिव्य लोग अनुपयोगी हो जाते हैं
मरे व्यक्ति से कोई संवाद नहीं कर सकता
सारे सुरक्षा करने वाले प्रहरी और देवता भी छोड़ जाते हैं
सांस पूरी तरह रुक जाने तक
गंध रह जाती है मृत देहतंतुआंे की
जैसे अनघड़ कोयला ठंडी राख में
जब पहुंचता है कोई मृत्यु संधि पर

जब मरते हैं कोई तब भी गिनता है तारीखें और सितारे
कोई रोता चिल्लाता है और गिड़गिड़ाता है
कोई सोचता है सांसारिक अच्छाईयों के बारे में
कोई जीवन भर की अथाह मेहनत से कमाई जायदाद के बारे में
जो अब दूसरे उड़ायेंगे

जबकि गहरा प्यार, और महान करूणा हो तो भी
जाना पड़ता है अकेले ही
सारे अच्छे दोस्त और साथी
बस मृत्यु द्वार तक ही आते हैं छोड़ने
अपने मित्र की देह के गट्ठर के साथ

अच्छी तरह कपड़े में लिपटी ढंकी हुई
देह पानी या आग को समर्पित की जाती है
या सहज ही भूमिगत कर दी जाती है सुनसान इलाके में
ओ मेरे वफादार दोस्ता आखिरकार क्या बचता है?
कल ही जब हमारी सांसे रुक जायेंगी
कोई संपत्ति या जायदाद काम नहीं आयेगी
तो फिर क्यों क्या अर्थ है एक व्यक्ति की जिंदगी का
क्या अर्थ है सगे संबंधियों का
क्या बस मृत्यु शैया के अगल बगल घेरा बनाकर खड़े रहने के लिए
और जब कि कोई भी किसी तरह सहायक हो ही नहीं सकता
जब जानते हैं कि सब छूट जाना है
सब जानते हैं कि सारे रिश्ते नाते बंधन निष्फल हैं
अंत समय आने पर
केवल धर्म साथ देगा

तो क्यों न कोशिश करें
मरने की तैयारी करें
सुनिश्चित हो तैयार रहें
जब समय आये तो कोई भय न रहे
और न ही पछतावा