Wednesday, 24 June 2009

बरस जा बादल

बरस जा बादल
सूरज की आग भरी अंगड़ाई
दुपहरी के तपते तवे को
डूबो दे मिट्टी की खुशबू में
रच जा रूह के नथनों में
कर दे पागल

बरस जा बादल
अब नहीं नहायेगी
सूखे पोखर की दरारों में
कोई अविछिन्नयौवना
न चलायेगी हल
यूं ही यूं ही तरस न बादल

बीज हैं जिंदा
धरती की कब्रों में
बन जल कर दे हल
लहरा जाने दे नभ तक
कोमल कोंपलों का बल

कुओं की गहराई
नदियों के कछार
तालों सागरों का विस्तार
मानव मन भी हार
हुआ है आकुल
बरस जा बादल

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Tuesday, 23 June 2009

बारिश का इंतजार है

गर्मी बहुत है
बारिश का इंतजार है
रोज शाम बादल गुजरते हैं सिर से
और मैं मुड़ मुड़ के देखता हूं
फिर........फिर से
क्या पता कहां पर
बूंदों का त्यौहार है

सुबह से शाम तक
चमकती घाम से
गहरी काली रात तक
किसी बूंद की आहट नजर नहीं आती
जलाये रखी है अभी तक
उम्मीदों की बाती
क्या पता कहां पर
मेघों का व्यापार है

गर्मी बहुत है
पंखे-कूलर फेल हैं
सांसों के लिए
शरीर जेल है
जिंदगी की गेल में
क्या पता कहां पर
बादल बिजलियाँ बहार है
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अभी तक गर्मी है

ठीक था
फसलों के पकने तक!
पर.....
बहुत दिनों से
गर्मी के बीत जाने की उम्मीदों के बाद भी
अभी तक गर्मी है

अभी तक सिर, गर्दन और छाती
पसीने से तरबतर है
शहर में कहीं भी पानी नहीं दिखता
सिवा मेरे शरीर के
सारे जोड़ों की चिपचिपाहट के

बेहद गर्मी है
अब तो इंतजार रहने लगा है
सुबह से शाम तक
कि कब ये मौसम गुजर जाये

गुजर जाये
सूरज का अस्खलित नारी सा घूरना
अलसुबह से
गहरी काली रात तक

गुजर जाये
मेरे जिस्म का सारा
पानी चूसने के बाद भी अतृप्त
प्यासी नजरों का ताप

गुजर जाये
बादलों का घिरना और उमस बन जाना
हवाओं का लू बनना
और सारी धरती को
पिघला देने की हवस बन जाना

गुजर जायें
कुआंे का सूखापन
पोखरों झीलों नदियों की दरारें
दिमाग को चकराते से
उष्ण लहरों के तीक्ष्ण किनारे

कि बहुत से लोग गुजर गये हैं
भला है गुजर जाये ये मौसम भी

Thursday, 18 June 2009

पिता जी

रोज, कोई नया अनुभव
मुझे ये बताता है
कि पिता जी सही थे

रोज, कोई नया अनुभव
मुझे ये बताता है
कि पिता जी की वो मजबूरी थी

रोज, कोई नया अनुभव
मुझे ये बताता है
कि पिता जी वहाँ कमज़ोर पड़ गये थे

रोज कोई नया अनुभव
मुझे मेरे पिता सा बना रहा है

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पिता का मतलब है,
, उम्र की क्लास
, आने वाले वर्षों की बात
, पूर्व चेतावनी
, ना दोहराओ कहानी
, पका होना
, मौत तक न थका होना

Thursday, 28 May 2009

Ajnabi ........ Dil Se

ऐ अजनबी तू भी कभी आवाज दे कहीं से
मैं यहां टुकड़ों में जी रहा हूं
तू कहीं टुकड़ों में जी रही है

रोज रोज रेशम सी हवा आते जाते कहती है बता
रेशम सी हवा.... कहती है बता..
वो जो दूध धुली मासूम कली वो है कहां... कहां है?
वो रोशनी कहां है वो चांद सी कहां है
मैं अधूरा तू अधूरी जी रही हैं

ऐ अजनबी तू भी कभी आवाज दे कहीं से
मैं यहां टुकड़ों में जी रहा हूं
तू कहीं टुकड़ों में जी रही है


तू तो नहीं है लेकिन तेरी मुस्कुराहटे हैं
चेहरा कहीं नहीं है पर तेरी आहटे हैं
तू है कहां .. कहां है? तेरा निशां कहां है
मेरा जहां कहां है
मैं अधूरा तू अधूरी जी रही हैं

ऐ अजनबी तू भी कभी आवाज दे कहीं से
मैं यहां टुकड़ों में जी रहा हूं
तू कहीं टुकड़ों में जी रही है

Film : Dil Se

A Ajnabi in 1963

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूं दिल नवाजी की
न तुम मेरी तरफ देखो गलत अंदाज नजरों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों में
न जाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज नजरों से
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेशकदमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जलवे पराये हैं
मेरे हमराह भी रूसवाईयां है मेरे माजी की
तुम्हारे साथ भी गुजरी हुई रातों के साये हैं
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

तार्रूफ रोग हो जाए - तो उसको भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाए - तो उसको तोड़ना अच्छा
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों

फिल्म गुमराह (1963)
Audio Video: http://www.youtube.com/watch?v=cE5q9kst-Zc